सर्वमयं संस्कृतं
@sarvaskt
सनातन काल से मंत्रद्रष्टा, सत्यद्रष्टा ऋषि भारत-भूमि पर समय-समय पर आगमन करते रहे हैं और देवता भी इस भारतभूमि पर जन्म लेने को लालायित रहते हैं – गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।। — विष्णुपुराण (२।३।२४) आदिकाल से लेकर वर्तमान काल तक महापुरुषों ने अपने तपोबल से इस भारत भूमि को सींचा है। यह ऋषियों का सातत्य और महापुरुषों की तपस्या का ही परिणाम है कि अनेक आक्रमण होने के पश्चात भी आक्रमणकारी कभी भी भारत को वैचारिक रूप से खण्डित नहीं कर सके। अखण्ड सनातन संस्कृति का विचार जैसे सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया:, सत्यमेव जयते, तत्त्वमसि, सर्वं खल्विदं ब्रह्म आदि महावाक्य प्राचीन काल से वर्तमान काल तक प्रत्येक भारतवासी के मानस में निरंतर गतिशील हैं और यह प्रवाह आगे भी इसी प्रकार बना रहेगा। इस देवभाषा के प्रवाह को जन जन तक पहुँचाने हेतु ही आपके समक्ष प्रस्तुत है - सर्वमयं संस्कृतम् | “राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम” समाज संस्कृतमय हो | यही उद्देश्य है |
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- Oct 1, 2011
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- "सर्वमयंसंस्कृतं""sarvamayamsanskritam'"sanskrit'dharma'संस्कृतंindia'bharata'sanskrit'
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